मालदीव के द्वीप! गूगल मैप खोलकर ढूँढो तो नज़र भी नहीं आते, झूम करने पर भी सिर्फ़ छोटे, छोटे डॉट्स ही नज़र आते हैं!यहाँ जा रहे हैं हम? आचंभित होकर बोली राधिका।
राहुल उसकी उन विस्तारित आँखों और उठी हुयी भौओं की ओर देखकर मुस्कुरा रहा था। मालदीव के इस टूर के लिए हामी भरने से पहले उसने भी सारी जानकारी हासिल कर ली थी। हिंदमहासागर में बसे इन द्वीपसमूहों को देखने की बड़ी उत्सुकता थी उसे।
दोनों भी तैयारी में जूट गए। वैसे तो इस साल कि शुरुआत से, जनवरी से ही उनका घूमना फिरना चल रहा हैं, तब जो बैग्ज उपर से उतारे थे वे वापिस रखे ही नहीं थे। एक के बाद एक घूमने के प्लान बनते ही जा रहे थे। दोनों बच्चे बाहर जॉब करते थे इसलिए उनके पास घूमने फिरने के लिए काफ़ी समय था।
जुलाई में वैसे ही मालदीव में बारीश ज्यादा होती हैं अतः छाता, रेनकोट, सैंडिल, बैग कवर लेना ज़रूरी था। मौसम का पूर्वानुमान भी देखा गया।
गुड़िया के कुछ वेस्टर्न ड्रेसेज़ यहाँ थे वो राधिका ने पहन कर देख लिए। आजकल सभी पहनते हैं ऐसे ड्रेसेज़, वो राहुल को अपना ड्रेस दिखाते हुए बोली। उसने भी पसंदी की गर्दन हिला दी। उसे तो राधिका ऐसे ड्रेसेज़ में बड़ी अच्छी लग रही थी।
१३ जुलाई, आज दोपहर २ बजे की फ़्लाईट हैं, बारीश फिरसे शुरू हो गई , मुंबई में बारीश में घर बाहर से कही भी जाना ऐडवेंचर से कम नहीं हैं अतः ९.३० तक घर से निकलने का सोचकर उन्होंने पैकिंग शुरू कर दी।
अमेरिका जाने की पैकिंग करते समय तो ऐसा डर नहीं लगता था, माले के लिए निकलते समय दिल धकधक कर रहा हैं, सोचकर राधिका मुस्कुराई।
मानसून का आगमन हो चुका है, फिर ऊपर से मुंबई में हाईवे के किनारे मेट्रो का काम चल रहा है जिससे ट्रैफिक अक्सर जाम हो जाता है, इसे ध्यान में रख राहुल ने हमेशा की तरह बोरीवली से एयरपोर्ट का एक घंटे का सफर सोच घर से एयरपोर्ट जाने को ओला टैक्सी बुक कर दी, पर उस दिन शनिवार था सो ट्रैफिक कम मिला फिर बारिश भी रुकी हुईं थी सो 35 मिनट में एयरपोर्ट पहुंच गए। १० बजे का समय....... छत्रपति शिवाजी इंटरनेशनल एअरपोर्ट…. दोनों ओर पाम के पेड़…. बारीश से धुले हुए, गहराया आसमान, कितना सुंदर दिख रहा हैं सब, राधिका सोच रही थी।
राहुल उसकी उन विस्तारित आँखों और उठी हुयी भौओं की ओर देखकर मुस्कुरा रहा था। मालदीव के इस टूर के लिए हामी भरने से पहले उसने भी सारी जानकारी हासिल कर ली थी। हिंदमहासागर में बसे इन द्वीपसमूहों को देखने की बड़ी उत्सुकता थी उसे।
दोनों भी तैयारी में जूट गए। वैसे तो इस साल कि शुरुआत से, जनवरी से ही उनका घूमना फिरना चल रहा हैं, तब जो बैग्ज उपर से उतारे थे वे वापिस रखे ही नहीं थे। एक के बाद एक घूमने के प्लान बनते ही जा रहे थे। दोनों बच्चे बाहर जॉब करते थे इसलिए उनके पास घूमने फिरने के लिए काफ़ी समय था।
जुलाई में वैसे ही मालदीव में बारीश ज्यादा होती हैं अतः छाता, रेनकोट, सैंडिल, बैग कवर लेना ज़रूरी था। मौसम का पूर्वानुमान भी देखा गया।
गुड़िया के कुछ वेस्टर्न ड्रेसेज़ यहाँ थे वो राधिका ने पहन कर देख लिए। आजकल सभी पहनते हैं ऐसे ड्रेसेज़, वो राहुल को अपना ड्रेस दिखाते हुए बोली। उसने भी पसंदी की गर्दन हिला दी। उसे तो राधिका ऐसे ड्रेसेज़ में बड़ी अच्छी लग रही थी।
१३ जुलाई, आज दोपहर २ बजे की फ़्लाईट हैं, बारीश फिरसे शुरू हो गई , मुंबई में बारीश में घर बाहर से कही भी जाना ऐडवेंचर से कम नहीं हैं अतः ९.३० तक घर से निकलने का सोचकर उन्होंने पैकिंग शुरू कर दी।
अमेरिका जाने की पैकिंग करते समय तो ऐसा डर नहीं लगता था, माले के लिए निकलते समय दिल धकधक कर रहा हैं, सोचकर राधिका मुस्कुराई।
मानसून का आगमन हो चुका है, फिर ऊपर से मुंबई में हाईवे के किनारे मेट्रो का काम चल रहा है जिससे ट्रैफिक अक्सर जाम हो जाता है, इसे ध्यान में रख राहुल ने हमेशा की तरह बोरीवली से एयरपोर्ट का एक घंटे का सफर सोच घर से एयरपोर्ट जाने को ओला टैक्सी बुक कर दी, पर उस दिन शनिवार था सो ट्रैफिक कम मिला फिर बारिश भी रुकी हुईं थी सो 35 मिनट में एयरपोर्ट पहुंच गए। १० बजे का समय....... छत्रपति शिवाजी इंटरनेशनल एअरपोर्ट…. दोनों ओर पाम के पेड़…. बारीश से धुले हुए, गहराया आसमान, कितना सुंदर दिख रहा हैं सब, राधिका सोच रही थी।
के झोन में इंडिगो की फ्लाईट, बेग्ज़ चेक इन किया, रिटर्न टिकिट और होटल की डिटेल्स भी देनी थी काउंटर पर, फ़ोटो लिए, स्नैक्स खाया, अभी ११ ही बजे थे, राहुल के दोस्त व उनका परिवार काफ़ी बाद पहुंचा, ६ लोगोंका ग्रुप हो गया उनका। सिक्युरिटी चेक पश्चात उनके साथ वीजा लाउंज में जा कर लंच लिया गया ।ड्यूटी फ़्री शॉप्स पर डिस्काउंट चल रहा था, फिर भी पश्मीना शाॉल, पद्मश्री एवार्ड विनर विवर के हाथो से बुनी हुई, उसकी क़िमत १ लाख, ४० हज़ार, विवींग बहुत खुबसुरत थी उसकी।
एमीग्रेशन क्लीअर हुआ। आज कही भी लंबी क़तारें नहीं मिली। १ बजे से बोर्डिंग शुरू हुआ।
मौसम में ख़राबी की वजह से फ्लाईट में टरब्यूलंस रहा। सीट बेल्ट लगाने की सूचना बार-बार आती रही। चार बज रहे थे और ये मालदीव उपर से नज़र आने लगा। महासागर में बसे हुए द्वीपों कि खुबसुरती देख कर सभी अल्हादित हो गए। छोटे छोटे टापू पानी में ऐसे लग रहे थे जैसे समुद्र में छोटे बड़े मोतियों को पिरो कर माला बनायी हो किसीने। समुद्र की चादर बिछी थी उसके रंग तो इतने प्यारे थे उपर वाले कि कलाकारी की जितनी तारिफ़ करो उतनी ही कम थी। जैसे जैसे प्लेन नीचे आ रहा था वैसे टापू साफ़ नज़र आने लगे । कुछ टापू पर रिसॉर्ट्स बने थे, उनके क़तार में बने हुए वाटर विला हमें अपनी ओर आकर्षित कर रहे थे। एअरपोर्ट नज़र आने लगा। २.१० पे वेलाना एअरपोर्ट मालदीव लैंड कर गए हम।
होटल बुक किया हुआ था - Sun Shine Beach। होटल की टेक्सी पिक-अप के लिए आगयी। होटल हुलहुमाले द्वीप पर था। एअरपोर्ट से होटल जाने के लिए होटलवाला टैक्सी के १० अमेरिकन डॉलर प्रति व्यक्ति के हिसाब से ६० डॉलर माँग रहा था, बड़ी मुश्किल से श्रेया ने उसे २५ डॉलर में ठहराया था। श्रेया और यश भी उनके मम्मी पापा के साथ शामिल हुए थे इस ट्रिप में। वेलाना एअरपोर्ट का टापू हुलहुमाले से एक ब्रीज से जोड़ा हुआ हैं। विश्वास नहीं होता कि यह द्वीप मानवनिर्मित है, चौड़ी सड़के , गार्डनस्, मस्जिद, नयी इमारतें ।
होटल बिलकुल समुद्र किनारे ही था। तो बस तैयार होकर आगए सब बीच पर ठंडी हवा खाने। होटल के सामने बीचपर बारबेक्यू और टेबलकुर्सी लगी हुई थी।
होटल में वाइफाइ था, इंटरनेट, वाटस्अप चल रहा इसलिए हमने इंटरनेशनल रोमिंग सेवा नहीं ली थी। मालदीव की करेंसी रुफीया, एमवीआर ख़रीदना था तो चल पड़े करेंसी एक्स्चेंज धूंढने। करेंसी एक्स्चेंज में अमेरिकन डॉलर ही ले रहे थे, भारतीय रूपया नहीं। एटीएम से डेबिट कार्ड से रुफिया निकालने का निश्चय हुआ। १ विड्रॉवल १०० रुफिया अतिरिक्त चार्ज देना पड़ा। ४.४५ भारतीय रुपए का १ एमवीआर। भारतिय रुपए की क़ीमत अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में इतनी कम? मालदीव जैसा छोटासा देश पर्यटन के क्षेत्र में भारत से अधिक विकसित! पूरी दुनिया से लोग यहाँ आते हैं घूमने। पर्यटन ही इनका मुख्य व्यवसाय हैं, दूसरा व्यवसाय हैं मछली निर्यात।
१४ तारीख़ के लिए पूरे दिन का लोकल आयलैंड टूर बुक कर दिया। इसमें शामिल था - सैंड आइलैंड, डालफिन वॉचिंग, स्नोर्कलिंग, लंच, विलेज वीजीट।निर्णय लिया गया कि १०००० एमवीआर राहुल के पास रहेंगे। ट्रीप पूरी होनेपर पूरा ख़र्च बाट लिया जाएगा। घूमने की प्लानिंग पूरी होने पर सभी को भूख लगी थी, होटल तंदूरी फ्लेम में डिनर लेने पंहुचे। श्रेया और यश को डिनर ऑर्डर करने की ज़िम्मेदारी दी गयी। राहुल और राधिका वेजीटेरियन थे पर ग्रुप में, सब के साथ नॉनवेज भी खाते थे। २ चिकन बिरयानी, १ चिकन नूडल्स - ३०८ एमवीआर।
खाना बुरा नहीं और बहुत अच्छा भी नहीं था, पेट भर गया। अब सब आराम करने होटल की ओर चल पड़े । होटल पास ही में था पर लिफ़्ट नहीं थी, रूम ४ थे माले पे थे, सीढ़िया चढ़ना अखर गया रातमें।
सुबह कोंटीनेंटल ब्रेकफ़ास्ट में ब्रेड ऑमलेट और चाय/ कॉफ़ी ।ब्रेकफ़ास्ट करके ९ बजे निकल पडे घूमने। टूर ऑपरेटर ने उन्हें गाड़ी से फेरी तक छोड़ा। मोटरबोट में २० - २५ लोग आ सकते थे। १०, १०.३० का समय था, धूप थी पर हवा भी चल रही थी इसलिए गर्मी नहीं लगी। स्वीडन से आयतित लकड़ी से बनी मोटरबोट पानी में झुलते हुए निकल पड़ी थी सैर करने। चमकदार गहरे नीले रंग की कई छटाएँ पानी मेंदिखाई दे रही थी। कहते हैं कि इस समुद्र में मौजूद सूक्ष जीव, प्लैंकटन की वजहसे यहाँ पानी चमकीले नीले, हरे रंग का नज़र आता हैं। क़ुदरत का यह नजारा देखते हुए वे आगे बढ़ रहे थे। गहरे नीले सागर में बीचमें बिल्कुल चमकीली हल्के नीले रंग की पट्टी नज़र आरही थी। ऐसी सुंदरता जिसका शब्दों में वर्णन करना मुश्किल हैं।
जहाँ तक नज़र दौडाओ दूर दूर तक फैला हुआ गहरा नीला पानी, क्षितिज रेखा पर आसमान से मिलकर नीले रंग कि हल्की छटा फैला रहा था, आसमान में बादल कतारमें आकर इस खुबसुरती को और बढ़ा कहे थे। बीचनें कही लहरें तेज़ हो जानेसे बोट झूलने लगती, वे सभी बोट में दोनों ओर सतुंलन बनाकर बैठ जाते थे।
अलग अलग आयलैंड पर बने कई रिसॉर्ट्स भी रास्ते में नज़र आए। इस बीच बोट की रफ़्तार का आनंद लेते हुए वे सब फ़ोटो खींचने में व्यस्त थे। हुलहुमाले टापू से समुद्र में ६/७ किमी दूर आ गए थे वे,यहाँ उन्हें पानी में डॉल्फ़िन दिखाई देने लगी थी, वे इतनी चपल थी कि उन्हें कैमेरे में क़ैद करना उनके लिए बेहद कठीन था।
वहाँ सें दूर चारों ओर नीले पानी में एक स्वच्छ शुभ्र चमकीली टापू नज़र आ रहा था, जहाँ उन्हें जाना था।
जैसे नज़दीक जा रहे थे उस टापू कि खुबसुरती उन्हें अपनी ओर खींचती जा रही थी।
टापू से कुछ दूरी पर बोट का लंगर डाल दिया गया। यहाँ पानी १५ - २० फ़ीट गहरा था। जिन्हें तैरना आता था उन्हें लाइफ़ जैकेट पहनकर टापू तक तैरकर जाना था। श्रेया को तैरना नहीं आता था, वो टायर की सहायता से टापू तक पहुँची, राधिका और संगीता बोट पर ही रूके। यहाँ जिन्हें स्नोर्कलिंग का मज़ा लेना हो उन्हें चश्मे और मास्क दिया जिसमें साँस लेने के लिए ट्यूब लगी थी। एक ग्रुप यहाँ स्कुबा डायविंग करते दिखायी दे रहा था। इतने बड़े महासागर में तैरने वाले ये लोग राधिका और संगीता को बड़े ही बहादुर, एडवेंचरस नज़र आ रहे थे।
एक छोटेसे चेंजींग रूम में कपड़े बदल कर वे फिर आगे बढ़े।
वहाँ सें दूर चारों ओर नीले पानी में एक स्वच्छ शुभ्र चमकीली टापू नज़र आ रहा था, जहाँ उन्हें जाना था।
जैसे नज़दीक जा रहे थे उस टापू कि खुबसुरती उन्हें अपनी ओर खींचती जा रही थी।
टापू से कुछ दूरी पर बोट का लंगर डाल दिया गया। यहाँ पानी १५ - २० फ़ीट गहरा था। जिन्हें तैरना आता था उन्हें लाइफ़ जैकेट पहनकर टापू तक तैरकर जाना था। श्रेया को तैरना नहीं आता था, वो टायर की सहायता से टापू तक पहुँची, राधिका और संगीता बोट पर ही रूके। यहाँ जिन्हें स्नोर्कलिंग का मज़ा लेना हो उन्हें चश्मे और मास्क दिया जिसमें साँस लेने के लिए ट्यूब लगी थी। एक ग्रुप यहाँ स्कुबा डायविंग करते दिखायी दे रहा था। इतने बड़े महासागर में तैरने वाले ये लोग राधिका और संगीता को बड़े ही बहादुर, एडवेंचरस नज़र आ रहे थे।
एक छोटेसे चेंजींग रूम में कपड़े बदल कर वे फिर आगे बढ़े।
आगे एक छोटे द्वीप पर उन्होंने लंच लिया। इस द्वीप पर फ़िश पैकेजिंग एवं एक्सपोर्ट की यूनिट थी। यहाँ के रेस्टोटेन्ट की ड्रैगन चिकन, ड्रैगन फ़िश ये डिशेस् किसी को पसंद नहीं आया। ३ बजे यहाँ से वापस निकल गए। बीच में फिरसे एक बार स्नोर्कलिंग आनंद ले कर फ़ोटो खिंचते हुए सब हुलहुमाले लौट आए।
दूसरे दिन १५ तारीख़ को दिन में फेरी से माले घूमने गए, वहा लंच लेकर वीलिंगीली बीच देखकर लौट आए। शाम को होटल के सामने वाले बीच पर स्नान का आनंद लिया। दूसरे दिन सुबह ८ बजे कि फ़्लाइट से मुंबई लौट आए।
घरसे निकलने से पहले ये टूर उन्ह काफ़ी मुश्किल लग रही थी वो ही अब आसान, आरामदायक , उत्साहवर्धक और रौमांचक भी लग रही थी।




